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Wednesday, 28 August 2024

वासना की फिसलन भरी राहें

 

कहानी में दो विवाहित युगल हैं.
आदित्य और दीपाली किराये पर वैभव और मेनका के घर में रहते हैं.

आदित्य और दीपाली के विवाह को अभी एक वर्ष भी नहीं हुआ था।
दीपाली का रूप, रंग, लावण्य, उसकी मस्त जवानी, हमेशा आदित्य के दिल और दिमाग पर छायी रहती।

दूध में केसर मिला जैसा उसका रंग, सांचे में ढला उसका बदन, उसकी 36-28-34 की फिगर और मस्त कर देने वाली कामुकता से आदित्य की तबीयत में हमेशा बेचैनी भरी तरावट रहती।

हालांकि आदित्य और दीपाली जी भर के जवानी के, सेक्स के, रोमांस के मजे ले रहे थे फिर भी आदित्य जब भी ऑफिस में होता दीपाली की छवि उसकी आंखों के सामने तैरती रहती।

जैसे ही उसे कुछ पल की फुर्सत मिलती, वह दीपाली के साथ पिछली रात की चुदाई के बारे में सोचने लगता और कई बार वासना के दबाव में ‘लंच ब्रेक में घर जाता और लंच के बजाय पंच करके लौट आता।’

तरह तरह के कामुक विचार उसको हमेशा घेरे रहते और इधर विवाह के समय ‘अक्षत कौमार्य वाली’ दीपाली भी, आदित्य से और आदित्य के लंड से मिलने वाले कामसुख से, इतनी प्रसन्न थी कि आदित्य की अनुपस्थिति में भी उसी का ध्यान करती रहती।

वैवाहिक सुख की प्रचुरता के कारण दीपाली की दीवानगी भी बढ़ी हुई थी।
हद यह थी कि किसी भी लंडाकर चीज, जैसे बैंगन, केला, बेलन, गाजर, मूली, झाड़ू, खीरा, भुट्टा, पर उसकी नजर पड़ती, उसका ध्यान आदित्य के लंड की ओर चला जाता।

कुल मिलाकर दोनों एक दूसरे को बेइंतेहा चाहते थे। एक दूसरे की प्राकृतिक जरूरतों का पूरा ध्यान रखते थे और एक दूसरे के सुख के लिए कुछ भी करने को हमेशा तैयार रहते थे।

टिंग टॉन्ग, टिंग टॉन्ग!
दीपाली नहाने जा रही थी, उसने अपना गाउन उतार कर धोने में डाल दिया था।

वह ब्रा और पैंटी में ही यह सोचते हुए दरवाजे की ओर दौड़ी कि लंच ब्रेक में आने वाला आदित्य आज 11 बजे ही कैसे आ गया?

उसने आगे बढ़कर दरवाजा खोला तो वह भौंचक्की रह गई.
सामने आदित्य नहीं बल्कि ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाला, उन का मकान मालिक, वैभव सिंह सिसोदिया खड़ा था।

वैभव सिंह एक 35 वर्षीय कसरती बदन वाला, आकर्षक व्यक्तित्व वाला युवक था, उस का कद 6 फुट, चौड़ा चकला सीना, गौर वर्ण, किसी भी महिला को आकर्षित कर सकता था।

आज तक वैभव और दीपाली ने कभी एक दूसरे को कामुक नजरों से नहीं देखा था पर अभी परिस्थितियां दूसरी थीं।

दीपाली के खिलते हुए यौवन को देखकर वैभव का लंड भी करवट ले रहा था और वैभव की अप्रत्याशित उपस्थिति से चकित दीपाली की धड़कनें भी बढ़ी हुई थीं।

दीपाली से यह गलती भी इसलिए हुई कि मकान मालिक वैभव ने भी आदित्य की तरह ही दो बार घंटी बजाई थी।
उसको यह भी ध्यान नहीं रहा कि वह दरवाजा खोलने से पहले कुछ पहन ले या कम से कम तौलिए से अपने बदन को ढक ले।

क्योंकि वे लोग आदित्य की नौकरी के कारण ही पहली बार जयपुर शहर में आए थे।
वहां उनका कोई रिश्तेदार या पूर्व परिचित नहीं था और सामान्यतः दिन में आदित्य को छोड़कर कभी कोई आता भी नहीं था।

जब दीपाली को अपनी अर्धनग्न स्थिति का ध्यान आया तो वह अंदर भागी और नया गाउन पहन के वापस आई.

उसने आ कर वैभव से नजर चुराते हुए पूछा- हां, कहिए वैभव जी, कैसे आना हुआ?
वैभव ने कहा- अरे आदित्य सर का फोन आया था, उनको ऑफिस के काम से जोधपुर जाना पड़ गया है. तुम्हारा फोन बंद आ रहा था इसलिए उन्होंने मुझे तुमको यह सूचना देने के लिए बोला था।

दीपाली ने कहा- ओह, मेरा फोन बंद हो गया था, मैंने उसे चार्ज करने के लिए तो लगा दिया था किंतु उसे ऑन करना भूल गई थी।

वैभव सीढ़ी की ओर बढ़ा और उतरने के पहले मुस्कुराते हुए बोला- दीपाली, यार दरवाजा खोलने के पहले थोड़ा ध्यान रखा करो फिर शरारत से आंख मारते हुए बोला, पूरे बदन में सनसनी मचा दी तुमने!
दीपाली झेंपती हुई बोली- जी, आइंदा ध्यान रखूंगी।

वैभव नीचे चला गया और दीपाली दरवाजा पुनः बंद करके अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को सामान्य करने के लिए बिस्तर पर लेट गई।
उसे बार-बार वैभव की उस के अर्ध नग्न बदन का जायजा लेती वे आंखें याद आ रही थीं जो दरवाजा खुलने पर उसके मादक जिस्म को निहार रही थीं.

वैभव ने तो आंखों ही आंखों में उसकी ब्रा और पैंटी तक उतार दी थी।
उसकी जिज्ञासु नज़रों ने उसके नंगे जिस्म का, उस की गोलाइयों का, उसके उभारों का, उसकी गहराइयों का पूरा पूरा आनंद ले लिया था।

कह सकते हैं कि उसने आंखों ही आंखों में, दीपाली के संग मनमर्जियां कर ली थी।
अजीब बात यह थी कि दीपाली को भी अपनी चूक पर शर्मिंदगी कम और सनसनी अधिक महसूस हो रही थी।

उसके लिए यह एक नया अनुभव था जो उसने जिंदगी में पहली बार आज महसूस किया था।
‘एक गैर मर्द द्वारा उसके अधनंगे शरीर को निहारे जाने का, रोम रोम को रोमांचित करने वाला अहसास!’

कुछ समय बाद उसने आदित्य को फोन लगाया.
घंटी की आवाज सुनते ही वह तो चुदाई के मूड में आ चुकी थी।

यूं भी उसकी चुदाई नियम से, दिन में दो या उससे अधिक बार होती थी।

आज बिना आदित्य का लंड लिए वह कैसे रात को सो पाएगी?
उसने आदित्य को बोला भी कि मुझे रात को तुम्हारा लंड लिए बिना कैसे चैन मिलेगा!

इस पर आदित्य ने कहा- अब यार जाना जरूरी था। मैं आकर तेरा कोटा पूरा कर दूंगा.
तो दीपाली ने उखड़े स्वर में कहा- भोजन समय पर चाहिए, 4 दिन का खाना एक साथ नहीं खा सकते.
और फोन काट दिया।

दीपाली की तबियत बड़ी अनमनी सी हो रही थी।
उसको ऐसा लग रहा था जैसे वैभव की आंखों के चुम्बक ने उसकी जान निकाल ली हो।

फिर भी नहाना तो था, दीपाली जैसे तैसे पलंग से उठी और नहाने के लिए बाथरूम में चली गई।

जब वह नहा कर निकली तो उसको भूख तो लग रही थी लेकिन उसका खाना बनाने का बिल्कुल भी मन नहीं कर रहा था।
किसी भी महिला को केवल खुद के लिए खाना बनाना पसंद नहीं आता।

वह यही सोच रही थी कि अगर खाना नहीं बनाती हूं तो फिर लंच में क्या लूंगी!
इतने में नीचे से आवाज आई- अरे दीपाली!

दीपाली ने जवाब दिया- जी कहिए!
तो वैभव ने कहा- अरे यार, मेरा भी खाना बना लेना क्योंकि मिसेज भी मायके गई हुई है।

दीपाली जैसे चैतन्य हो उठी, उसका शरीर एकाएक अजीब से उत्साह से भर गया, वह फटाफट सब्जी काटने लगी और बाद में आटा लगाते हुए उसने सोचा कि उसमें अचानक ये ऊर्जा कैसे आ गई?

जवाब में फिर उसको वैभव की, उसके अर्ध नग्न जिस्म को निहारती वे मुग्ध आंखें याद आ गईं।
उसने अपने सिर को झटका और खाना बनाने में सक्रिय हो गई।

खाना बना के उसने वैभव का खाना एक टिफिन में पैक किया और नीचे देकर आने के लिए उतरी।

उस के दिल की धड़कन फिर बढ़ने लगी, सांसों में तपन महसूस होने लगी, उसका रक्त संचार तेज होने लगा।
सुबह के कुछ लापरवाह पलों ने, उस के तन मन में हलचल मचा दी थी।

दीपाली ने खाना वैभव की डाइनिंग टेबल पर रखा और जाने लगी तो वैभव ने आवाज़ लगाई- अरे दीपाली सुनो तो सही!
तो दीपाली ने कहा- आदित्य का फोन आने वाला है, मैं बाद में आती हूं!

और सरपट बाहर निकल गई।
उसका दिल जोरों से धड़क रहा था।

सुबह का दृश्य और वैभव की ललचाई हुई आंखें उसके दिमाग से निकल नहीं पा रही थीं।

दिन में खाना खाने के बाद वह सोने के लिए लेटी लेकिन बहुत समय तक उसके दिमाग में तरह-तरह के विचारों का झंझावात चलता रहा।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह सुबह की घटना को भुला क्यों नहीं पा रही?
वह यह भी नहीं समझ पा रही थी कि उसके मन में ग्लानि का भाव क्यों नहीं आ रहा था?

ऐसे ही ख्यालों में खोई हुई, पता नहीं कब उसकी आंख लग गई।

दीपाली सो कर उठी तो उसकी तबीयत बेचैन थी।
उसे लगा कि नींद ठीक से नहीं आई, कच्ची नींद में बहुत से सपनों ने, शरीर को आराम पहुंचाने के स्थान पर थकान से भर दिया था।

इतने में नीचे से वैभव की आवाज़ सुनाई दी- दीपाली! दीपाली, नीचे आ जाओ, चाय साथ ही पिएंगे।
दीपाली ने कहा- जी, आई!
उसका ध्यान ‘नीचे आ जाओ’ शब्दों पर गया, अनायास ही उस के होठों पर मुस्कान आ गई।

चाय पीते हुए वैभव ने दीपाली को कहा- परेशान दिख रही हो, नींद ठीक से नहीं आई क्या?
दीपाली ने कहा- जी, कुछ बेचैनी सी रही!

इसके बाद वैभव और दीपाली चाय पीते रहे.

वैभव एकटक दीपाली को निहार रहा था, उसके चेहरे को, उसके मन को, पढ़ने की कोशिश कर रहा था।

दीपाली वैभव से नज़रें चुरा रही थी।
उसे लग रहा था कि जैसे वैभव उससे कुछ कहना चाहता है लेकिन निर्णय नहीं ले पा रहा है कि क्या कहे और कैसे कहे?
इतना निश्चित था कि जो कुछ भी कहेगा उसकी बेचैनी को बढ़ाने वाला होगा।

चाय खत्म होने के बाद वैभव ने दीपाली को कहा- मैंने डिनर भी ऑर्डर कर दिया है, तुम कुछ बनाना मत, खाना नीचे साथ ही में खाएंगे।
दीपाली ने हामी भरी और ऊपर आ गई।

शाम को उसने सोचा कि खाना तो बनाना नहीं है, छत पर जाकर थोड़ी ठंडी हवा खाई जाए, शायद कुछ तसल्ली मिले।

छत पर मखमली अंधेरा पसरा पड़ा था।
दीपाली एक कोने में जाकर बैठ कर ठंडी हवा झोंकों का आनन्द लेने लगी।

इतने में छत के दूसरे कोने में उसकी नजर पड़ी.
वहां वैभव टहल रहा था और एक हाथ से बार-बार अपने लंड को सहला रहा था, बीच-बीच में थोड़ा सा वह लंड को पड़कर दबा भी रहा था।

दीपाली को ऐसा लगा कि वैभव को भी सुबह के दृश्य ने जकड़ रखा है।
‘वैभव को भी बेकरार पा कर दीपाली के दिल को अजीब सा करार आया।’

दीपाली चुपके से छत से नीचे उतर आई और इंतजार करने लगी डिनर के बुलावे का!
उसके मस्तिष्क में विचारों का झंझावात निरंतर बना हुआ था।

वह प्रकृति के इस पर-पुरुष और पर-स्त्री आकर्षण को समझने की कोशिश कर रही थी।

आमतौर पर माना जाता है कि असंतुष्ट पत्नी और पत्नी की उपेक्षा के कारण कामसुख से वंचित पति ही इधर उधर, किसी अन्य की ओर आकर्षित होते हैं और अपनी दमित इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश करते हैं।

लेकिन दीपाली के साथ तो ऐसा नहीं था.
उसने और आदित्य ने तो जी भर के एक दूसरे की देह का दोहन किया था।
सभी संभव आसनों का प्रयोग करके एक दूसरे को हर तरह का शारीरिक सुख पहुंचाया था।
उनके बीच तो आज तक कहा सुनी भी नहीं हुई थी.

फिर ऐसा क्या हो गया कि सुबह से वैभव का चेहरा उसकी आंखों के सामने से हट नहीं रहा था?

उधर वैभव तो जैसे इस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाने के चक्कर में था, उसे ऐसा लग रहा था जैसे कुदरत ने उसे यह मौका इसलिए दिया है, जिससे वह दीपाली जैसे तरोताजा फल का स्वाद ले सके।

दीपाली को ज़रा भी अंदाजा नहीं था कि शाम को छत पर टहलते हुए वैभव जानबूझकर अपने लंड को सहला और दबा रहा था क्योंकि उसने कनखियों से दीपाली को वहां आकर बैठते हुए देख लिया था और वह उसकी कामवासना को सुलगाना और भड़काना चाह रहा था।

शाम के 8:30 बजे होंगे, वैभव की आवाज आई- दीपाली डिनर आ चुका है ‘नीचे आ जाओ!’
दीपाली ‘नीचे आ जाओ’ शब्द सुनकर फिर मुस्कुराई।

वह इस स्थिति का मजा भी ले रही थी, साथ ही साथ इन विशेष कामोद्दीपक परिस्थितियों में वह अपने मन को बहकने से रोक भी रही थी।

वह मिठाई की प्लेट लेकर नीचे उतरने लगी, उसको ऐसा लग रहा था जैसे उसके कदम भारी हो गए हैं।

वैभव ने बहुत शानदार खाना मंगवा के डाइनिंग टेबल पर सजा दिया था।
और वैभव के मुंह में दीपाली और मिठाई दोनों को देखकर पानी आ रहा था।

खाना खाते हुए दीपाली वैभव से नज़रें चुराती रही और वैभव दीपाली को एकटक निहारता रहा।
जब भी दीपाली ने चोरी से वैभव को देखना चाहा, हर बार उन दोनों की नज़रें टकरा जाती और वैभव मुस्कराने लगता और दीपाली झेंप कर रह जाती।

खाना खाते हुए इधर-उधर की सामान्य बातें भी चलती रही।
वैभव यही विचार कर रहा था कि अभी नहीं तो कभी नहीं वाला अवसर मिला है।

खाने के बाद दीपाली ने मिठाई की प्लेट उठाकर वैभव के सामने लाते हुए कहा- वैभव जी, मुंह मीठा कीजिए।

वैभव ने मौका ताड़ते हुए कहा- यार दीपाली, मैं तुमसे बड़ा जरूर हूं पर इतना भी बड़ा नहीं हूं कि हम मित्र ना बन सकें! मुझे वैभव कहो।
दीपाली ने कहा- जी, वैभव मिठाई लो।

वैभव की मित्र वाली बात सुनकर और उसकी नीयत को भांपकर दीपाली का चेहरा शर्म से लाल हो गया.
वह समझ रही थी कि घटनाक्रम किस ओर बढ़ रहा था.
और वह यह भी जान रही थी कि दुविधा केवल उसको है।

वैभव तो पूरी तरह से इस अवसर का लाभ उठाते हुए दीपाली के साथ ‘विशेष प्रणय संबंध’ स्थापित करना चाह रहा था।

दीपाली ने बर्तन समेटे और उन्हें धोने के लिए सिंक की ओर बढ़ी।
उसके साथ वैभव भी किचन में मदद करने के बहाने से आ गया जबकि उसका इरादा कैसे भी करके बस दीपाली के संग रहने का था।
दीपाली के मना करने के बावजूद वह बर्तन धोने लगा।

बर्तन धोते हुए बीच-बीच में दोनों के हाथ आपस में छू जाते तो दीपाली के तन-बदन में तरंगे सी उठने लगती.
वैभव तो ठहरा मर्द, दीपाली के हाथों के स्पर्श सुख से उसकी नस-नस में सनसनी हो रही थी।

बर्तन साफ करने के बाद वैभव ने दीपाली को रोके रखने की मंशा से चाय बना ली और चाय लेकर डाइनिंग टेबल पर कुर्सी खींच के बैठ गया.
दीपाली उसके पास वाली कुर्सी पर बैठी थी।

वैभव ने हिम्मत बटोरी और दीपाली के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा- दीपाली एक बात कहूं?
दीपाली का पूरा शरीर झनझना उठा, उसने वैभव के हाथ से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा- कहिए।

वैभव ने कहा- दीपाली, तुमने कुदरत के इस संयोग पर गौर किया कि कल सुबह ही मेरी पत्नी कोटा गई और आज तुम्हारे पति भी जोधपुर के लिए निकल गए। उन दोनों के जाने के बाद पीछे से इस सूने घर में सिर्फ हम दोनों हैं। क्या तुम्हें यह नहीं लगता कि प्रकृति यह चाहती है कि हमें अपनी तनहाई दूर करते हुए इस अवसर का लाभ उठाएं चाहिए? जब से तुम इस मकान में आई हो, मेरा दिल तुमसे मिलने के लिए तड़प रहा है, क्या तुम्हारे मन में भी मेरे लिए कुछ कोमल भावनाएं हैं? या नहीं?

दीपाली के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला, वह गूंगी गुड़िया सी बैठी सुनती तथा सोचती रही कि वैभव ने कैसे उसके सामने इतना सब बोल दिया!

वैभव ने फिर कहा- दीपाली, मेरी बात का जवाब दो. क्या मैं तुम्हें बिल्कुल पसंद नहीं? क्या हम इस वीराने में बहार ला सकते हैं या नहीं? कुछ तो बोलो दीपाली!

दीपाली ने कहा- आदित्य का फोन आने वाला है, मैं ऊपर जाती हूं!
और वह बिना कुछ जवाब दिए उठकर जाने लगी.

पीछे से वैभव ने कहा- दीपाली, मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।

पर दीपाली दौड़ कर वैभव के डाइनिंग हॉल से बाहर निकल के ऊपर चली गई और ऊपर जाकर पलंग पर निढाल होकर गिर पड़ी, उसके कानों में अभी तक वैभव के प्रणय निवेदन के लिए कहे शब्द गूंज रहे थे।

सुबह की उसकी छोटी सी चूक ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि वह खुद नहीं समझ पा रही थी कि वह करना क्या चाहती है।

उसने आदित्य के बारे में सोचा जो बहुत खुले विचारों और बड़े दिल वाला है, इतना ही नहीं वह उसको जी जान से प्यार भी करता है।
फिर उसका मन भटकने पर उतारू क्यों है? (The Other Man Sex Infatuation)

क्या वह वैभव के प्रणय निवेदन को स्वीकार कर ले? क्या कुछ पलों का आनंद, उसके जीवन को तनाव और दुख से भर तो नहीं देगा? क्या एक पर-पुरुष के पास जाकर, वह आदित्य की मोहब्बत का अपमान तो नहीं करेगी?

इस पर उसके मन ने बहकाने वाला तर्क किया कि रोज घर का सादा खाना खाने वाला व्यक्ति, जब कभी बाहर चाट पकौड़ी, पिज़्ज़ा बर्गर आदि खा लेता है तो क्या उससे, घर के खाने का अपमान हो जाता है?
क्या एक रात वैभव के साथ गुजार लेने से, उसके मन में आदित्य के लिए जो प्यार है, वह कम हो जाएगा?

पोर्न वीडियो देखते हुए क्या हर स्त्री और पुरुष, उस से कामोत्तेजना प्राप्त नहीं करता? उससे आनंद लेना, क्या इंसान के मन में दबी हुई, नये स्वाद की लालसा का परिणाम नहीं?

क्या अन्तर्वासना की पति पत्नी के प्रेम पर आधारित कोई एक भी कहानी ऐसी है, जिसने पाठकों की कामुकता को बढ़ाया हो?
जवाब मिलेगा- शायद नहीं।
वास्तविकता यह है कि विवाहेत्तर संबंधों पर आधारित कहानी ही पाठकों में सनसनी उत्पन्न करने की क्षमता रखती है।

फिर कब तक किसी स्त्री का चरित्र, केवल चूत के पैमाने से तोला जाता रहेगा?
कोई स्त्री एकनिष्ठ होकर भी बहुत बुरी हो सकती है। कोई एक से अधिक मर्दों के साथ संबंध रख कर भी अपने कृतित्व से महान हो सकती है।

इसलिए प्रश्न इस बात का है कि ‘पेट की भूख और जिस्म की भूख को, एक समान महत्व क्यों नहीं दिया जा सकता?’

क्या नए स्वाद की शौकीन जुबान और विविधता पसंद दिमाग, एक ही चेहरे और एक ही जिस्म से ऊब नहीं जाता?
और क्या इंसान के जीवन में यही ऊब, यही नीरसता, पारिवारिक तनाव को जन्म नहीं देती?

इतना तो दीपाली को विश्वास था कि यदि बाद में आदित्य को उसने बता भी दिया तो वह खुले मन से, उसकी मन स्थिति को समझते हुए, उसके क्षणिक भटकाव को ज्यादा तूल नहीं देगा।
किंतु अनिर्णय का शिकार तो वह स्वयं थी।

वह सोच रही थी कि लोग यह गलत समझते हैं कि औरत की चूत में केवल एक प्राकृतिक सील ही होती है, जिसे पहली चुदाई में पति या प्रेमी तोड़ता है।

वास्तव में औरत की चूत में नैतिक बंधनों वाली एक सील और होती है, जिसे पहला गैर मर्द तोड़ता है।
पहली बार किसी गैर मर्द के पास जाने के पहले, औरत को बहुत हिम्मत जुटाना पड़ती है।

कई तरह की शंका, कुशंका उसे घेरे रहती है, उसे इन आशंकाओं से बाहर निकल कर, मन को नया आनंद दिलाने के लिए प्रण करना पड़ता है।

फिर जब पहले पर पुरुष द्वारा, स्त्री की यह दूसरी सील टूट जाती है तो उसके साथ स्त्री की झिझक, उसका संकोच भी टूट जाता है और उसमें कभी भी, कहीं भी, किसी के भी साथ, संबंध बनाने का साहस आ जाता है।

अब धीरे धीरे उसका मन भी वैभव की इस बात पर यकीन करने लगा कि कुदरत ने उन दोनों को, एक नया आनंद उठाने के लिए ही, यह स्वर्णिम अवसर प्रदान किया है।

दीपाली उठी, बाथरूम में जाकर नहाई और फिर उसने अपनी सबसे अधिक सैक्सी पारदर्शी नाइटी पहनी और कामवासना के प्रभाव में बेसुध होकर बढ़ चली अपने जीवन के पहले गैर मर्द वैभव के पास।

सीढ़ी उतरते हुए दीपावली ने देखा कि वैभव ने डाइनिंग हॉल वाले दरवाजे को खोल रखा था जिससे उसे बरामदे में होकर न जाना पड़े और किसी पड़ोसी की, उस पर नज़र पड़ने की भी कोई आशंका नहीं रहे।
दीपाली मन ही मन वैभव की इस सावधानी पर मुस्कुरा उठी।

जब दीपाली ने दरवाजा खोला तो देखा वैभव भी अभी अभी नहा कर बाहर आया था और केवल लुंगी बांधे, बालों में कंघी कर रहा था।
वह यह देख कर दंग थी कि वैभव को कितना विश्वास था कि दीपाली उस के पास जरूर आएगी।

वैभव ने दीपाली को जब सैक्सी नाइटी में आते देखा तो उसका दिल बल्लियों उछलने लगा, अब इस बात में तो कोई संशय नहीं था कि दीपाली चुदने के इरादे से ही, उसके पास खुद चल के आई थी।

वैभव ने अपनी बाहें फैला दी और दीपाली वैभव के सीने से लग के पूरे सुकून के साथ उसके दिल की धड़कनों को सुनने लगी।

दीपाली को वैभव की बाहों में सुरक्षा का वो ही अहसास हो रहा था, जो आदित्य की बाहों में होता है।

वैभव ने कहा- ओह दीपाली, आई लव यू!
और उसके माथे पर एक चुंबन ले लिया।

दीपाली पहले पर पुरुष के पहले चुम्बन से सिहर उठी; उसकी आंखें बंद हो गईं।

वैभव ने दीपाली की दोनों बंद आंखें भी चूम ली।
दीपाली का समूचा अस्तित्व कमजोर पड़ रहा था, वह फिर सोचने लगी कि हे भगवान, यह मैं क्या करने जा रही हूं?

उसके बाद वैभव ने दीपाली की ठुड्ढी पर हाथ रखकर, दीपाली के चेहरे को ऊपर उठाया.
दीपाली की आंखें बंद थी और होंठ कंपकपा रहे थे।

इतने में वैभव के लरजते होंठ दीपाली के सुर्ख गुलाब की दो पत्तियों जैसे अधरों पर ठहर गए और जुबान दीपाली के नाज़ुक होठों का रस लेने लगी।

जब कोई मर्द किसी स्त्री के होठों को चूमता है तो उसका एक हाथ स्वतः ही उसके बूब्स पर पहुंच जाता है।

वैभव का दाहिना हाथ, दीपाली के बांए उरोज तक पहुंच गया, वैभव होंठ चूसते हुए दीपाली के बांए स्तन को सहलाने लगा।

दीपाली के शरीर का अंग अंग कामाग्नि में सुलगने लगा।
यह वो पल था जहां से अब वापस लौटना असंभव था।

दीपाली ने अब पूरी तरह बहाव के साथ बहने का निश्चय कर लिया और वैभव की काम आसक्ति के सामने समर्पण करने की ठान ली।

वैभव ने दीपाली की नाइटी की डोर खींच दी.
उसकी नाइटी, उसके स्निग्घ बदन से फिसलती हुई नीचे गिर पड़ी।

वैभव के सामने दीपाली, एक बार फिर ब्रा और पैंटी में खड़ी थी।

सुबह तो उसका यह रूप अनायास ही देखने को मिल गया था, वो भी सीमित समय के लिए … तब उसको छूना तो जैसे वर्जित था।

जब कि अभी तो दीपाली आनंद प्राप्ति के उद्देश्य से, स्वेच्छा से अपना रूप, अपनी जवानी लेकर प्रणय लीला के लिए वैभव के सामने प्रस्तुत थी।

वैभव को अपने शहद भरे अधरों का रसपान कराने के बाद दीपाली की नजर पड़ी वैभव की लुंगी पर!
उसको वैभव की लुंगी में तंबू तना हुआ साफ साफ दिखाई दे रहा था।
दीपाली की चूत में गुदगुदी सी हुई।

उसकी इच्छा तो हुई वैभव के लंड को पकड़ने की … पर वह जल्दीबाजी के पक्ष में नहीं थी; वह चुदाई के इस खेल का पूरा आनंद लेना चाहती थी।

उधर वैभव को अब दीपाली के अमृत कलश ललचा रहे थे।

वह पलंग पर बैठ गया और दीपाली को अपनी ओर खींचा.
दीपाली अब वैभव की प्रेम दीवानी बन चुकी थी, वह मंत्रमुग्ध सी उसके इशारों पर नाच रही थी।

वैभव ने दीपाली की छातियों के बीच मुंह देकर उसकी ब्रा के हुक को खोल दिया।
उसके गुलाबी रंगत वाले दूधिया कबूतर आजाद होकर वैभव के हाथों में कुलबुलाहट एवं होठों में सरसराहट पैदा करने लगे।

वैभव ने दोनों हाथों में दोनों स्तनों को थाम कर उनकी कोमलता और उनकी पुष्ट गोलाइयों का स्पर्श सुख लिया।

लेकिन…
वैभव अधिक देर तक इंतजार नहीं कर सका और दीपाली की छोटी छोटी किशमिश जैसी निप्पलों को अपने होठों में लेकर चूसने लगा।
उसके दोनों हाथ दीपाली के दोनों स्तनों को बारी बारी से मथ रहे थे।

दीपाली की वासना भी अब पूरी तरह से भड़क चुकी थी.
इस बात का प्रमाण उसकी रिसती हुई चूत थी जो अब पूरी तरह से तर हो गई थी और उसका गीला निशान अब पैंटी पर साफ दिखाई दे रहा था।

दीपाली ने वैभव को खड़ा किया और उसकी लुंगी की गांठ खोल दी.
वैभव का 7 इंच लंबा और 3 इंच मोटा लंड दीपाली के सामने मस्ती में झूम रहा था।

दीपाली ने देखा कि वैभव का लंड आदित्य के लंड जैसा ही लंबा और वैसा ही मोटा भी था।
एकमात्र आकर्षण यह था कि यह उसके पति आदित्य का नहीं, उसके पहले गैर मर्द वैभव का लंड था।

दीपाली की दहकी हुई चूत में सरसराहट बढ़ने लगी।
उसने काम विकल होकर अपने जीवन के पहले पर पुरुष के सांवले सलोने लंड को पकड़ लिया जो लोहे की गर्म छड़ जैसा कड़क हो रहा था।

वैभव का लंड पकड़ते ही दीपाली की कामेच्छा ने उसे विवश कर दिया, उसके होंठ स्वतः ही वैभव के लंड की ओर बढ़ चले।

वह घुटनों के बल होकर लंड के सुपारे को होठों में लेकर उस पर अपनी जुबान गोल गोल घुमाने लगी।
एक दो बार आधे से ज्यादा मुंह में लेकर उसे अपने मुखलार से तर कर के उठ गई।

बेकरार वैभव ने दीपाली की ओर देखा.
वह मुस्कुरा रही थी।

वैभव ने अपने मन को धीरज रखने के लिए समझाया एवं दीपाली की पैंटी को नीचे खींच दिया।
दीपाली की चूत से खुशबू का एक झोंका सा उठा।

पर नारी की चूत की खुशबू से मस्त वैभव ने उस की चिकनी चूत देख कर उससे पूछ ही लिया- दीपाली, एक बात तो बताओ, यह तो आज ही साफ की हुई लगती है?
दीपाली ने बोला- हां, आज ही शाम को साफ की थी।

इस पर वैभव ने फिर पूछा- इसका मतलब तो यह हुआ कि तुम खुद भी चुदने के लिए मानसिक रूप से तैयार थी? फिर मुझे तरसा क्यों रही थी?

दीपाली ने कहा- नहीं, मैं एकदम तैयार नहीं हो गई थी बल्कि दुविधा में थी। मेरा एक मन मुझे तुम्हारी तरफ धकेल रहा था, दूसरा मन मेरे पैरों में नैतिकता की बेड़ी डाल रहा था।

फिर दीपाली हंसकर बोली- लेकिन मुझे पता नहीं क्यों इस बात का अंदाज़ा था मेरे गुंडे … कि तुम अपने मकसद में कामयाब हुए बिना मुझे छोड़ने वाले नहीं हो इसलिए मैंने सोचा कि अपनी तरफ से भी तैयारी तो कर ही ली जाए।

वैभव दीपाली की बातों से खुश था, उसने मुस्कुराते हुए दीपाली को बाहों में भरकर अपने साथ पलंग पर बैठा लिया और खुद खड़े होकर चुसवाने की लालसा में, अपना लंड फिर से दीपाली के मुंह के सामने लहराने लगा।

दीपाली उसकी मंशा को समझ गई और बोली- यह तो पहले से ही कड़क हो चुका है, एक बार इस को दुलार भी चुकी हूं। यूं भी तुम क्या इतनी जल्दी मानने वाले हो? ओरल को अगली बार के लिए पेंडिंग रखो मेरे राजा!

वैभव ने कहा- चलो ठीक है. ओरल करो मत … पर मुझे तो ओरल का मजा लेने दोगी न?
दीपाली ने कहा- क्यों नहीं, आदित्य भी हमेशा ही ठोकने के पहले ओरल जरूर करता है।

उसके बाद वैभव ने दीपाली को पलंग के किनारे पर बैठे-बैठे ही लेटा दिया जिससे उसकी चूत चाटने में आसानी रहे.
दीपाली के दोनों पैर पलंग से नीचे लटके हुए थे।

वैभव ने दीपाली के दोनों पैरों के बीच घुटनों के बल बैठकर दीपाली की तर चूत पर एक प्रगाढ़ चुम्बन दिया।
दीपाली के मुंह से सिसकारी निकल गई, आखिर उस की चूत को पहली बार किसी पराए मर्द के होठों ने छुआ था।

वैभव भी आदित्य की ही तरह चूत के नमकीन मगर नशीले रस का दीवाना था।
उसके होंठ दीपाली की चूत के रस में भीग चुके थे।

उसको शरारत सूझी, उसने ऊपर उठकर दीपाली के होठों पर अपने होंठ रख दिए।

दीपाली ने वैभव के होंठ चूस कर, स्वयं की चूत से निकले नशीले, दिव्य रस का स्वाद लिया और फिर से वैभव को नीचे की ओर धकेलने लगी जिससे कि वह उसे पूरा ओरल सुख देने के लिए, उसकी चूत में मुंह दे सके।

वैभव ने अब दीपाली की चूत को दोनों हाथों से चौड़ा कर के, उस में अपनी जुबान को प्रवेश कराया।
उसकी लपलपाती जुबान दीपाली की चूत के हर हिस्से में पहुंच रही थी।

वैभव कभी जुबान से चूत रस के चटखारे लेता और कभी चूत के होठों को अपने होठों में जकड़ कर चूसने लगता।

आखिर वैभव की मेहनत रंग लाई।
दीपाली के मुंह से बार-बार सिसकारियां निकलने लगीं, उसकी नसों में रक्त संचार तेज होने लगा।

मस्ती की हिलोरों के कारण उसके शरीर की प्रत्येक मांसपेशी में ऐंठन होने लगी।

जब वैभव ने यह पाया कि दीपाली बस, अब झड़ने ही वाली है तब उसने शरीर के काम ऊर्जा के केंद्र क्लिटोरिस को होठों से पकड़ के जुबान से चूसना शुरू कर दिया।

दीपाली ने अपने दोनों पैर वैभव के कंधों पर रखे और एकदम ऊपर उठ गई.
उसका शरीर तन के एकदम धनुषाकार हो गया, चूत जोर जोर से फड़की, उसमें से आनंद का झरना फूटा और कुछ ही पलों में शरीर शिथिल हो गया।

दीपाली अब पलंग पर पड़ी, आंखें बंद करके लंबी-लंबी सांसें ले रही थी, उसके होंठ सूख गए थे।
उसकी जिंदगी का यह एक विलक्षण अनुभव था जब एक पराए मर्द ने उसकी चूत का चूषण करके उसको इतना शानदार ऑर्गेज्म दिया था।

दीपाली ने अपने आपको धन्यवाद दिया क्योंकि यदि वह पाखंडी समाज की थोपी हुई नैतिकता के वैचारिक जंजाल से बाहर नहीं आती तो आज के इस अनमोल, अनुपम आनंद से वंचित रह जाती।

वह कई मिनट तक इस ऑर्गेज्म के हर स्पंदन का काम सुख लेती रही।
उसने आंखों ही आंखों में वैभव को इस शानदार चरम सुख के लिए धन्यवाद दिया।

दीपाली एक बार तो झड़ चुकी थी किंतु उसकी चूत की चुदाई तो अभी बाकी थी।

उसने वैभव से पानी मांगा, दो घूंट पानी पीने के बाद दीपाली फिर से लेट गई।

वैभव का लंड तो अभी भी खड़ा था, उसने दीपाली से पूछा- चुदाई शुरू करें?
तो दीपाली बोली- अभी अभी तो तुमने मेरा दम निकाला है, थोड़ा ठहरो वरना मुझे तो बिल्कुल मजा नहीं आएगा।

वैभव यह सुनकर दीपाली की बगल में लेट के उसके पूरे बदन को, सहलाते हुए कामुक बातें करने लगा।
बीच-बीच में उसके स्तनों और चूतड़ों को दबाना नहीं भूलता।

दीपाली भी अब उससे खुलकर बात कर रही थी और लगातार उसके लंड को सहलाते हुए उसके अति संवेदनशील कंचों से खेल रही थी।
जिससे उस का लंड कहीं मायूस होकर, सिकुड़ कर अपनी खोल में न चला जाए।

वैभव ने दीपाली से आदित्य के बारे में जानकारी ली कि उसे चुदाई में क्या 2 पसंद है?
इसी प्रकार दीपाली ने भी वैभव से मेनका के बारे में पता किया कि उसे किन पोजीशन में अधिक मजा आता है?

दोनों ने उनकी फेंटेसी के बारे में भी चर्चा की।

थोड़ा आराम और मस्ती भरी बातों का यह असर हुआ कि दीपाली की चूत में फिर से खलबली मचने लगी।
उसकी चूत यह संकेत देने लगी कि वह वैभव के नए लंड से चुदने को अब एकदम तैयार है।

अतः दीपाली ने वैभव से कहा- अब मुझे तपाना शुरू करो और तोड़ दो मेरी सील!
वैभव ने चौंकते हुए कहा- सील? अरे वह तो आदित्य ने कभी की तोड़ दी होगी, अब कहां बची होगी सील?

इस पर दीपाली ने मुस्कुराते हुए कहा- आदित्य ने तो मेरी प्राकृतिक सील तोड़ी है लेकिन हर औरत की एक स्वनिर्मित सील और होती है, जिसे पहला गैर मर्द तोड़ता है। मेरी वह सील आज तुम तोड़ोगे मेरे रा…जा!
वैभव के मुंह से निकला- वाह दीपाली, क्या नई थ्योरी लेकर आई हो मेरी रानी!

दीपाली की बात से वैभव का जोश बढ़ गया।
वह दीपाली के दोनों वोबों को बारी बारी से दबा दबा के चूसने लगा, उसके चूतड़ सहलाने लगा।

बीच-बीच में वह उसकी गांड के छेद को बीच वाली उंगली से कुरेद भी देता तो दीपाली के शरीर में झुर झुरी सी दौड़ जाती।

थोड़ी ही देर में दीपाली चुदने के लिए बेताब होने लगी।
जब उससे रहा नहीं गया तो वह कातर स्वर में बोली- वैभव, अब डाल भी दो ना … प्लीज!
वैभव ने पूछा- क्या?
दीपाली स्त्री सुलभ लज्जा के साथ झूठा गुस्सा करते हुए वैभव के सीने पर मुक्के बरसाती हुई बोली- गंदे आदमी!

वैभव हंस दिया, उसने फिर चुदाई के लिए तकिये के नीचे से कंडोम निकाला।

दीपाली ने जब यह देखा तो वह बोल पड़ी- यह क्या कर रहे हो?
वैभव ने कहा- सावधानी बरत रहा हूं, कहीं ठहर गया तो?

इस पर दीपाली ने मुस्कुराते हुए कहा- अभी मेरा सुरक्षित समय चल रहा है। यूं भी कंडोम मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है, अगर तुमने कंडोम पहना तो सारा मजा किरकिरा हो जाएगा। तुम्हारे और मेरे बीच में, मुझे एक धागा भी नहीं चाहिए।

वैभव तो यह सुनकर झूम उठा।
क्योंकि यह तो सच है ही कि कंडोम के कारण चुदाई के मजे में निश्चित रूप से कमी आती है।

वैभव ने कहा- दीपाली, मैं तो खुद बिना कंडोम के तुम्हें चोदना चाहता था। तुमने तो मेरे मन की बात कह दी।

फिर वैभव ने दीपाली के बांए पैर को अपने दाहिने कंधे पर रखा और उसकी प्राकृतिक मुख लार से चिकनी हुई चूत पर, अपने लंड का सुर्ख सुपारा टिका के, एक जोर का झटका दिया।

दीपाली के मुंह से एक जबरदस्त सिसकारी निकल गई।
वह बोली- इतनी बेरहमी से ठोकोगे क्या?
हालांकि उसे वैभव का जोश और उस की बेसब्री से आनंद आ रहा था।

पहली बार उसकी देह के ऊपर था नया सुदर्शन चेहरा, नई बलिष्ठ देह और उसकी चूत में था नया सलोना मजबूत लंड।
कितना सुखद अहसास था यह!

वैभव ने कुछ देर ठहर कर दो तीन लंबी लंबी सांसें ली और फिर ‘फूलों से सजी सेज पर दीपाली की गुलाब के फूल सी चूत को को रौंदना शुरू कर दिया।’

दीपाली हर धक्के का जवाब उछल उछल कर दे रही थी।
‘वह चुदाई के इस खेल में अपने वासना भरे तन, नए स्वाद को आतुर दिमाग़ और कामुक मन से शामिल थी’ और जी भर के इस खेल का मजा ले रही थी।

दीपाली सुबह से शाम तक जिस संशय में थी, जिन सवालों से घिरी हुई थी, अब उनसे पूर्णतः मुक्त थी।
‘अभी वह केवल वैभव के प्रयास और उसके दुस्साहस से प्राप्त अवसर से, आनंद उलीचना चाह रही थी।’

वैभव ने 15 – 20 मिनट तक रुक रुक कर दीपाली की भीषण चुदाई की.
जैसे ही दीपाली का चरम उठने वाला होता और वैभव रुक जाता।

पहले तो दीपाली अधिक से अधिक, रगड़ों के मजे लेने के लिए, चाह रही थी कि यह प्रक्रिया चलती रहे पर अब वह झड़ने के लिए बेताब थी।

उसने वैभव को बोला- वैभव अब रुकना मत, अब मैं झड़ना चाहती हूं। अब लगातार करो, रुकना मत, हां … हां … ऐसे ही … कस के … ज़रा कस के … ऐसे ही … ऐसे ही … हां…हां … मैं गई … गई … गई!

उसी समय वैभव ने भी दीपाली की चूत के अंदर बहुत गहरे में अपने वीर्य की पिचकारी छोड़ी और उसके ऊपर निढाल होकर गिर पड़ा।

दोनों की सांसें उनके काबू में नहीं थीं, दोनों लंबी और गहरी सांसें ले रहे थे.
वासना की आग ठंडी होने के बाद की यह बेचैनी कुदरत ने शायद इसलिए रखी है जिससे स्खलन पश्चात के उन पलों का आनंद बहुत देर तक लिया जा सके।

दोनों पसीने में लथपथ भी हो चुके थे।

कुछ देर पहले वैभव के शरीर का जो भार, दीपाली को अपूर्व सुख पहुंचा रहा था, अब दीपाली को अखरने लगा।

उसने वैभव को अपने ऊपर से नीचे की ओर धकेला, दोनों करवट लेकर संतुष्टि भरी मुस्कान के साथ एक दूसरे को निहार रहे थे।

वैभव बोला- मजा आ गया दीपा … थैंक यू!
दीपाली बोली- जब तुमने इतने प्यार से दीपा बोला है तो मुझे थैंक यू बोलने की कतई जरूरत नहीं है मेरे बलमा!
और वैभव के होंठ चूम लिये।

दीपाली आगे बोली- आज की सारी मस्ती का श्रेय तो तुमको ही जाता है. तुमने संयोग से मिले इस अवसर का लाभ उठाते हुए न केवल पहल की. बल्कि ‘नीचे आ जाओ’ ‘नीचे आ जाओ’ बोलकर मेरी कामुकता को भी जगा दिया। मुझे इतना विवश कर दिया कि मुझे तुम्हारे नीचे आना पड़ा।

वैभव हंसते हुए बोला- मेरे द्वारा बेख्याली में बोले गए इन शब्दों का तुम पर इतना असर इसलिए हुआ क्योंकि हर इंसान किसी ना किसी तरह जीवन में नया सुख चाहता है। तुम्हारे अवचेतन में भी इस तनहाई का फायदा उठाने की हसरत जरूर रही होगी।
इस पर दीपाली ने कहा- हां यार, तुम ठीक कह रहे हो. हमने पोर्न वीडियो देखते हुए कई बार गैर मर्द और पराई औरत के बारे में बातें की थी। तब मुझे लगता था कि मैं शायद ऐसा नहीं कर पाऊंगी. लेकिन तुम्हारे व्यक्तित्व और तुम्हारी बातों ने मुझे मजबूर कर दिया। आज मैं बहुत खुश हूं कि मैं अपने आप को गलत सिद्ध कर पाई।

वह आगे बोली- मैं हम दोनों के बीच अब तक जो भी हुआ उस से बहुत खुश हूं, तुम्हारी बाहों में बहुत संतुष्ट भी अनुभव कर रही हूं और पीछे लौटने के सारे रास्ते मैं बंद कर के आई हूं।

वैभव बोला- दीपाली, हम दोनों भी पोर्न वीडियो देखते हुए इसी प्रकार की बातें करते रहते हैं लेकिन अभी तक कोई ऐसी मिली ही नहीं थी कि जो मेरे दिल में हलचल पैदा कर दे। पर जब से तुम यहां रहने आई, तभी से मैंने यह ठान लिया था कि जब भी मौका मिला, तुम्हें अपने नीचे लाकर मानूंगा। अब तो बस मेरी यही तमन्ना है कि मेरी मेनका तुम्हारे विश्वामित्र की तपस्या भी भंग कर दे! तभी हम चारों निःसंकोच, बिना किसी डर के, जीवन पूरा पूरा आनंद ले पाएंगे।

दीपाली ने कहा- हां सही बात है, मैं भी यही सोच रही थी। यह और भी अच्छी बात है कि मेनका पराए मर्द के साथ खेल खेलने के लिए राजी है। अब आदित्य को मनाना मेरी जिम्मेदारी है।

वैभव और दीपाली दोनों नंगे लिपटे चिपटे सुनहरे भविष्य के रंगीन सपने बुनने लगे।

क्योंकि दोनों जोड़े एक ही बिल्डिंग में रहते हैं तो किसी को भी पता चलने की कोई गुंजाइश भी नहीं रहेगी।
आराम से थ्रीसम, फोरसम, स्वैपिंग, स्विंगिंग, चारों का जैसा मन करेगा, वैसा खेल वे लोग खेल पाएंगे।

दो बार झड़ने के बाद दीपाली की वासना तो शांत हो चुकी थी फिर भी उसे अपने नंगे बदन पर वैभव के हाथों का प्रेमल स्पर्श सुहा रहा था।

वैभव तो ठहरा मर्द, उसका वीर्य तो निकला भी एक ही बार था. फिर उस पर कमाल यह कि उसको मिली दीपाली जैसी परी की नई चूत, उसका लंड शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। उसकी प्रबल इच्छा थी कि एक बार दीपाली लंड चूस के उस का वीर्य निकाल दे। वह तभी सुख की नींद सो पाएगा.

वह उठा, वॉशरूम जाकर वापस आया।
उसके बाद उसने दीपाली के चेहरे के सामने अपने लंड को फिर हिलाया और बोला- देख यार दीपा, यह शांत होने का नाम नहीं ले रहा।

दीपाली उसकी भावना को समझ गई कि वह चुसवाना चाहता है।
इसलिए वह शरारत भरी मुस्कान के साथ बोली- तो मैं क्या करूं? बर्फ लगा लो इस पर! शांत हो जाएगा।

वैभव समझ गया कि दीपाली उसको छेड़ रही है।
उसने कहा- दीपा, इसको शांत होने के लिए बर्फ की ठंडक नहीं, तेरे मुंह की गर्मी चाहिए।

दीपाली देख रही थी कि कुछ ही घंटों पहले जो संबंध औपचारिक थे, वासना के खेल के कारण अब अंतरंग हो चुके थे।
वह नहीं चाहती थी कि उसका विभु आज की रात मायूस हो कर सोए।

दीपाली पलंग के किनारे बैठी, उसने मुस्कुरा के विभु के आधे तने हुए लंड को अपने हाथों में पकड़ा और उसके सुपारे पर निकल आए प्रीकम को चाटा; उसके बाद में गोल सुपारे को चारों ओर से जुबान से सहलाया, एक दो बार मुंह के अंदर बाहर किया।

इतना करने के बाद उसने वैभव को चेतावनी दी- खबरदार जो वीर्य मेरे मुंह में निकाला।

उसके बाद दीपाली ने लंड की चमड़ी को आगे पीछे किया।
लंड दीपाली की मुख लार से चिकना हो गया था।

दीपाली के होंठ चूत की तरह बन गए.

अब वैभव की कमर हरकत करने लगी।
वह आगे पीछे होकर लंड को मुंह के अंदर अधिक से अधिक घुसेड़ने की कोशिश करने लगा।
कभी-कभी तो उसका लंड दीपाली के हलक तक जा पहुंचता।

दीपाली समझ गई कि वैभव मानेगा नहीं! यदि उसने चेहरा पकड़ के हलक तक लंड घुसेड़ के वीर्य स्खलित कर दिया तो वो कैसे रोक पाएगी?

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